Real Story Of Horror

The Real Story of Horror, Most Real - Life Ghost Stories From Real People, Real Life Events, These Horror Stories Aren't For The Faint of Heart, Comedy Horror stories & Other Funny Story

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Friday, January 10, 2020

January 10, 2020

उलझे बालों वाली लड़की

उलझे बालों वाली लड़की का रहस्यम कहानी :- The mysterious story of a girl with tangled hair.





वैभव जो 26 साल का है उसकी अभी अभी नयी शादी हुई है और उसकी एक खूबसूरत सी बीवी भी है। ,  ये दोनों हनीमून बनाने हिमाचल गए थे जहाँ उन्होंने 4 दिन गुजारे। अब उनके दिल्ली अपने घर वापस आने का समय हो गया था। दोनों अपनी गाड़ी में बैठ गए और दिल्ली के लिए चल दिए।  रात के 11 बज गए थे अब वो हिमाचल की घाटी को पार करने ही वाले थे। रोड बिलकुल सुनसान थी और गाडी बिलकुल तेज़ी में जा रही थी ।




 अचानक वैभव को अपनी गाड़ी के आगे एक औरत दिखी जिसने लाल रंग की साड़ी पहनी थी। वो दूर से ही हाथ हिला कर गाडी को रोक रही थी।   उसको देख कर वैभव की बीवी ने उसे गाडी रोकने से मना कर दिया क्योंकि उसको डर था की ये कोई लूट पाट करने की चाल हो सकती है।  लेकिन वो औरत गाड़ी के सामने आगई जिससे वैभव को गाडी रोकनी पड़ी। वो औरत ज़ोर ज़ोर से दरवाज़े को पीटने लगी उसके चेहरे के हाव भाव से ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी बड़ी मुसीबत में हो।,   वैभव की बीवी ने उसे गाडी का दरवाज़ खोलने से मना कर दिया उसने कहा कि ये कोई चाल हो सकती है हमें बहार नहीं जाना चाहिए ।  पर वैभव ने बोला की अगर सच में ये किसी मुसीबत में होगी तो और उसे हमारी जरुरत हो क्योंकि उसको देख कर वो अच्छे खासे घर की लग रही थी। ये बोलते ही वैभव ने गाडी का दरवाज़ा खोल दिया और बाहर आ गया।


 वो औरत घबराते हुए बोली ” प्लीज, मेरी मदद करो “। वैभव ने बोला क्या हुआ है।उस औरत ने जवाब दिया की ” मेरी गाड़ी नीचे खाई में गिर कर एक पेड़ से टकरा गई है और उसमें मेरी छोटी सी बच्ची फसी हुई है। प्लीज उसको बाहर निकालो ” ,  ये सुनते ही वैभव की बीवी भी बाहर आगई और तीनों खाई की और भागे। उन्होंने देखा की वो गाडी थोड़ी नीचे एक पेड़ से टकराई हुई है। वैभव झट से नीचे की और गया। उसने देखा की पीछे वाली सीट पर एक बच्ची बैठी है  जो रो रही है। वैभव ने दरवाज़ा खोलना चाहा पर वो नहीं खुला। दरवाज़ा अटका हुआ था। उसने बोहोत कोशिश की तब जा कर वो दरवाज़ा खुला।



वैभव ने उस लड़की को बहार निकाल कर अपनी गोदी में रख लिया।  पर लड़की अभी भी रोए जा रही थी और मम्मी मम्मी कर रहा थी। तभी वैभव की नज़र आगे वाली ड्राइविंग सीट पर गयी जहाँ उसे कोई बैठा हुआ लगा। लेकिन आगे वाली गाडी का शीशा धुंधला था तो साफ़ नज़र नहीं आरहा था।  उसने अपने कपडे से उसे साफ़ किया । और जो वैभव ने देखा उसे देख कर उसकी पैरो तले ज़मीन ही खिसक गई। उसको विश्वास ही नहीं हो रहा था। ,  उसने देखा की आगे वाली सीट पर और कोई नहीं उस बच्ची की माँ थी जो मदद के लिए वैभव को बुला रही थी। उसने देखा की वो औरत के माथे से खून निकल रहा है और उसकी मौत हो चुकी है।


 वैभव की पत्नी ने वैभव की हालत देख कर झट से उसके पास आई और वो भी ये मंजर देख कर हैरान हो गयी ।ये देखते ही वैभव और उसकी पत्नी ने पीछे की और देखा जहाँ वो औरत खड़ी थी पर वहाँ अब कोई नहीं था।

Thursday, January 9, 2020

January 09, 2020

जब मुझे अनजान नंबर से आई कॉल

उस वक़्त मेरे पास नोकिया का हैंडसेट मोबाइल हुआ करता था। जो हमेशा साइलेंट मोड़ पर ही रहता था। 

At that time, I used to have a Nokia handset mobile. Who was always on silent turn.




बात आज से करीब छह साल पहले कि है। उस वक़्त मेरे पास नोकिया का हैंडसेट मोबाइल हुआ करता था। जो हमेशा साइलेंट मोड़ पर ही रहता था। क्योंकि उस वक़्त मैं बारहवीं में थी और सहेलियों से जीवन भरा था। हर वक़्त कोई न कोई सहेली का मिस्ड कॉल या कॉल आ ही जाता था। मेरे पिता नाराज़ हो जाते थे।


ऐसे ही एक दिन की बात है। मैं बस में बैठकर कॉलेज जा रही थी। और मेरा फ़ोन मेरे हाथ में ही था। तभी अचानक फ़ोन वाइब्रेट मोड़ पर बजने लगा। वाइब्रेशन मोड़ की मुझे आदत नहीं थी, इसलिए अचानक हुए इस हरकत से मैं घबरा गयी और फ़ोन छूटकर हाथ से नीचे गिर गया। और सिर्फ़ नीचे ही नहीं गिरा फ़ोन उछलकर बस से नीचे जा गिरा। क्योंकि मैं दरवाज़े के पास वाले सीट पर ही बैठी थी।


ख़ैर कंडक्टर जी अच्छे थे। उन्होंने जल्दी ही बस रुकवाई और मेरा फ़ोन जाकर उठा लाएं। भयानक एक्सीडेंट ने मेरे फ़ोन का बाल भी बांका नहीं किया था। वो बिल्कुल सुरक्षित था।

मेरे हाथ में फ़ोन के आते ही मैंने सबसे पहले उसे साइलेंट मोड़ पर किया। पता नहीं कैसे ये खुद ब खुद वाइब्रेट मोड़ पर चला गया था। उसके बाद कॉलेज पहुँचकर मैंने उस अनजान नंबर पे कॉल लगाया जिसका फ़ोन आने के दौरान ही फ़ोन मेरे हाथ से छूट गया था। बड़ा गन्दा सा कॉलर ट्यून लगा रखा था बन्दे ने  जैसे "आप


 बीती" भूतिया सीरियल शुरू होने से पहले  कुछ डरावने धुन बजते है, बिल्कुल वैसा ही। काफ़ी देर तक रिंग जाने के बाद किसी ने फ़ोन उठाया। पर बोला कुछ नहीं। मैं हेलो हेलो करती रही पर उधर से कोई जवाब नहीं आया बस बैकग्राउंड में किसी के चीखने की, कभी हँसने की,और कभी रोने की आवाजे आती रही। एक पल के लिए तो मेरा भी दिल धक से रह गया कही ये किसी भूत बुत का नंबर तो नहीं। डरकर मैंने फ़ोन काट दिया। पर अब उधर से फ़ोन आने शुरू हो गए। मैं जब भी उठाती वहीं सब सुनाई देता कोई कुछ नहीं बोलता। मैं परेशान होकर फ़ोन काट देती।


कुछ दिनों बाद एक दिन जब मैं कॉलेज के कैंटीन में सहेलियों के साथ बैठी थी। तब फ़िर उस नंबर से कॉल आने लगा मैं बार बार कॉल डिसकनेक्ट करती पर बार बार फ़ोन आने लगता। तभी मुझे परेशान देखकर मेरी एक सहेली ने पूछा कौन परेशान कर रहा तुझे? मैंने मज़ाक मज़ाक में उस से कह दिया कि ये कोई भूत का नंबर है। तो वे सब सीरियस हो गयी और सभी ने मुझसे वो नंबर ले लिया। मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती थी। वैसे भी बन्दे ने मुझे बार बार फ़ोन कर कर के परेशान ही कर रखा था। अब जब मेरी सहेलियां उसे तंग करेगी तब मुझे भी बहुत मज़ा आएगा।

मैंने गौर किया कि उस दिन के बाद से उस अनजान नंबर से कॉल आना काफ़ी हद तक कम हो गया था। पर कॉलेज के अंदर एक नई चीज शुरु हो चुकी थी। भूत के नंबर का आदान प्रदान करना। हर किसी के जुबान पर बस यही रहता था। कि "भूत का नंबर लेगी"? इस बात का इतना ज़्यादा फैलना इसलिए भी आसान हुआ क्योंकि उस नंबर का जो कॉलर ट्यून था वो भी भूतिया था। और कॉल उठाने के बाद जो बैकग्राउंड से तरह तरह की आवाज़ आती थी वो भी डरावना था। ले दे के वो जो कोई भी बन्दा था वो बुरी तरह फंस चुका था।


अब तो दीवारों पर भी पढ़ने को मिलता "भूत का नंबर 9356****" यकीन न हो तो कॉल लगाकर देख लेना"।
हद तो तब हो गयी जब एक दिन मेरी छोटी बहन उस नंबर को कागज़ में लिखकर ले आयी और मुझसे "बोली दीदी इस नंबर पे कॉल लगाओ न एक बार ये भूत का नंबर है"। उस दिन मैं हँसते हँसते लोट पोट हो गयी और घर में सबको बता दिया कि भूत का नंबर मैंने ही वायरल किया था। पर पापा ने बहुत डांट लगायी और ये भी कहा कि फ़ोन कर के उसे सॉरी कहूँ।


मुझे भी बेचारे पर अब तरस आने लगा। मैंने उस नंबर पर एक बार और कॉल लगाया। कई बार फ़ोन काटने के बाद आखिरकार उसने फ़ोन उठाया, तो मैंने हेलो बोले बग़ैर ही कहना शुरू कर दिया। "भूत महाशय आप जो भी है मैंने बस आपसे इतना कहने के लिए फ़ोन किया है कि, आप पर जो आजकल नयी मुशीबत आयी है न ये मेरी ही वजह से हुआ है।


मैंने ही आपका नंबर भूत के नंबर से फेमस कर दिया। क्योंकि आप बार बार मुझे कॉल करते थे, और कुछ बोलते तक नहीं थे। दूसरी बात ये है कि आपने जो अपना कॉलर ट्यून भूतों वाला लगाकर रखा है न, ये बदल दीजिये। और बैकग्राउंड में जो ये भूतिया आवाज़ आती है इसे भी बदलिए अगर आप इस मुशीबत से बाहर आना चाहते है तो । हो सके तो अपना सिम कार्ड ही बदल दीजिये"। इतना सुनने के बाद उसने फ़ोन काट दिया।


पर दस मिनट बाद उधर से दुबारा कॉल आया। इस बार कोई बैकग्राउंड आवाज़ नहीं थी। बन्दे ने अपनी आवाज़ से बोला "बेवकूफ लड़की तुमने मेरी जिंदगी को झंड कर रखा है। हर दिन मेरे पास 500 कॉल आते है और सभी यही पूछते हैं कि आप भूत बोल रहे है क्या? मैं बेचारा टी.वी. दुकान में काम करता हूँ। मेरे सामने मेरा खड़ूस मालिक बैठा रहता है इसलिए मैं फ़ोन में कुछ बोल भी नहीं पाता। और दुकान में ढेर सारे टी.वी. एक साथ चालू रहते है इसलिए बैकग्राउंड में वही सब आवाज़ जाती होगी।




मैंने  दो महीने पहले ही नया फ़ोन खरीदा था नए सिम कार्ड में बैलेंस भी ज़्यादा था इसलिए अनजान नंबरो में कॉल लगा लगा कर अनजान लोगों की आवाज़ें सुनता था। बस कुछ बोल नहीं पाता था। उन्हीं में से एक तुम्हारा भी नंबर था। पर मुझे तुम्हारी आवाज़ बहुत अच्छी लगी थी, इसीलिए तुम्हें बार बार कॉल कर देता था। पर तुमने तो अच्छा मज़ा चखाया मुझे। अब जैसे बात फैलाई थी वैसे ही इसे बंद करवाओ। मैं अपना नंबर नहीं बदल सकता। ये कहकर उसने गुस्से से फ़ोन काट दिया।



मैं बहुत देर तक बेचारे की किस्मत पर हँसती रही। जितना हो सके मैंने सबको समझाया की ये भूत का नंबर नहीं है। पर एक बार जीभ से निकली बात कहा वापस आती है।


गुस्सा शांत होने के बाद उसने मुझे दुबारा कॉल किया। और कुछ दिनों बाद ही हमारी दोस्ती हो गयी। इस बात को छह साल गुज़र चुके थे। पर कल जब मैं अपने पति के साथ नाश्ता कर रही थी तभी मेरे पति के नंबर पर एक अनजान कॉल आया, और पति के फ़ोन उठाते ही उधर से डरते डरते किसी लड़की की आवाज़ आयी " ये भूत का नंबर है क्या? मुझे ये नंबर मुम्बई के लोकल ट्रेन के बाथरूम में लिखा मिला" पति का फ़ोन स्पीकर पे था। लड़की की बात सुनते ही हम दोनों एक साथ खिलखिलाकर हंस पड़े।


फ़िर हँसते हँसते मैंने उस लड़की को जवाब दिया जी बिल्कुल ये भूत का ही नंबर है, और मैं भूत की पत्नी भूतनी हूँ।।।।

Wednesday, January 8, 2020

January 08, 2020

रहस्यम ताबीज़ वाली कहानी का क्या राज़ है

जब वह कब्रिस्तान के भीतर चली गई फिर उसमे क्या हुआ :- What happened when she went inside the cemetery. 




बहुत संक्षेप में एक कहानी बुर्के वाली दो औरतों की। कहानी की शुरुआत एक औरत से होती है जिसका पति बहुत बीमार था। दवा-दारु चल रही थी। लेकिन उसके पति के स्वास्थ्य में कोई लाभ न हुआ। तो बाबाओं के यहाँ चक्कर लगाना शुरू किया। एकदिन वह एक ऐसे आदमी से मिली जो अपने आप को काले इल्म और रूहानी ताकतों का मालिक बताता था।


उसने औरत से कहा- तु अगर अपनी मदद करने को खुद तैयार है तो मैं तेरी मदद कर सकता हूँ। उसने महिला को तीन रुई की बाती जैसी एक चीज दी और कहा- रात को कब्रिस्तान में जाना इसे जलाना और एक पुकारना कोई ना कोई तेरी मदद को जरूर आएगा।



वो कैसा होगा मैं बता नहीं सकता वो औरत हो या फिर मर्द हो, बहुत सुन्दर हो या बहुत भंयकर हो लेकिन तु डरना नही वो जो पूछे उसका जबाब देना तुझें मदद मिल जाएगी। औरत घर पहुची लेकिन पति को कुछ नहीं बताया। वह फैसला नहीं कर पा रही थी। कही वो जाल में तो नहीं फंस जाएगी, इस जमाने में कौन इस तरह की बात में विश्वास करता है। लेकिन रात होते ही उसने तय कर लिया की पति के लिए वह ये जोखिम भी उठाएगी। रात को वह एक झोले में सारा समान लेकर टार्च के साथ कब्रिस्तान के गेट पर पहुँच गई।



 उसने अपने साथ अपने पति का पुराना रामपुरी चाकू भी रख लिया था क्योंकि उसने तय कर लिया था की स्थिति बदली तो या वो जान ले लेगी या जान दे देगी। गेट पर पहुँचकर उसकी हिम्मत जबाब देने लगी। तब उसे अपने पति का चेहरा याद आया।


वह कब्रिस्तान के भीतर चली गई, निर्धारित जगह पर तीनों बत्तीया जलाई फिर उस ना को पुकारने लगी। कुछ देर बाद
 वहाँ दो बुर्के वाली औरते आई और कहा- क्या चाहिए तुझे????
औरत ने कहा- मेरे पति  ठीक हो जाए
उधर से आवाज आई- तो जान चाहिए तुझे.........
जान के बदले क्या दे सकती है?????
औरत गंभीर हो गई और कठोर शब्दों में कहा-मैं अपनी जान दे सकती हूँ अपने पति की जान के बदले....


बुर्केवाली दोनों औरतों की हसी सुनसान कब्रिस्तान में गूंज उठी
उनमें से एक ने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा- ले ये ताबिज 21 दिनों तक के लिए अपने पति के गले में डाल देना और फिर निकाल देना..
और सुन लड़की हमारा काम लेना नही देना है।



औरतें फिर अंधेरे में गायब हो गई। औरत घर लौट आई ताबिज पति को बांध दिया। अब दवाओं का असर कहिए या ताबिज का कमाल उसका पति एक महीने में ठीक हो गया।


औरत माँ बनी, फिर सास बनी, फिर दादी बनी और अपने पोते-पोतियों के लिए उसकी ये कहानी..... एक जाति के रूप में संरक्षित हो गई। 
January 08, 2020

Room No.13 की एक अनसुलझे रहस्यम कहानी

यहा एक सच्ची कहानी जब Room No. 13 मे आज तक कोई नहीं जाता आता है :- Here is a true story when no one comes to room NO. 13. 



मै आपको अपने मित्र नीलेश की बहन नीलिमा और उसकी साली नीतू की आप बीती आप लोगो को बताना चाहती हु | कुछ दिनों पहले नीलेश ने मुझे बताया था कि उसकी बहन की मौत हो गयी है ये सुनकर मै बहुत दुखी हो गयी और मैंने उसकी मौत का कारण पूछा तो उसने पुरी घटना मुझे सुनाई | कुछ दिनों पहले नीलेश उसकी बहन नीलिमा और साली नीतू के साथ कही घुमने गये थे | नीलेश की बहन और नीतू दोनों बहुत अच्छी दोस्त थी |


लौटते वक़्त काफी रात हो गयी थी | रास्ते में उसकी बहन की तबियत खराब हो गयी थी उसे काफी ठण्ड लग रही थी | हमारा घर अभी भी 100 किमी दूर था और रास्ते में कोई भी रुकने की जगह नहीं मिल रही थी | थोड़ी देर के बाद हमे एक होटल दिखाई दी तो नीतू ने होटल में रुककर उसकी बहन को आराम देने को कहा|  उस होटल के काउंटर पर हमने जब रूम के लिए पुछा तो उसने बताया कि सभी रूम फुल थे क्योंकि उस रास्ते पर केवल वही एक ढंग की होटल थी | लेकिन तभी होटल के मेनेजर ने बताया कि एक रूम खाली था

Room No.13

हमने उस समय अन्धविश्वासी वाली बातो को ना सोचकर रूम ले लिया | जैसा कि आप लोग जानते है कि रूम न०. 13 को अशुभ माना जाता है और कई होटलों में इस नंबर का कोई रूम नहीं होता है लेकिन ये होटल कई साल पुराना था |  जैसे ही वो तीनो उस रूम में गये तो उन्हें नेगेटिव एनर्जी महसूस हुई | उस रूम की कंडीशन तो ठीक थी लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से यहा कोई रहने नहीं आया हो |उन्होंने कुछ ज्यादा नहीं सोचा | अब वो अपनी बहन नीलिमा के लिए काउंटर से पैनकिलर लेने को गया | काउंटर से टेबलेट लेकर जैसे ही रूम में आया तो देखा कि उसकी बहन बालकनी में खडी बाते कर रही थी नीलेश में सोचा नीतू और उसकी बहन दोनों बालकनी में बाते कर रही है लेकिन जैसे ही उसके पास गया तो उसकी बहन के अलावा कोई नहीं था |


उसने उसकी बहन से पुछा कि तुम किससे बाते कर रही थी तो उसने सिर्फ सर हिला कर मना कर दिया | तभी नीतू वाशरूम से आयी |  नीलेश घबरा गया की अगर नीतू वाशरूम में थी तो नीलिमा किससे बात कर रही थी | नीलेश ने नीलिमा को टेबलेट दी और सो जाने को कहा |अब नीतू और नीलिमा दोनों बेड पर सो गये और नीलेश सोफे पर सो गया | सुबह जब क्लीनर कमरे की सफाई के लिए आया तो दरवाज़ा खुला था | और वो जब अंदर आया तो देखा की कमरे में खून की खून था और नीलिमा मर चुकी थी | क्लीनर जोर से चिल्लाया तो मेरी नींद खुल गयी और देखा कि नीलिमा की मौत हो चुकी थी और नीतू बेहोश हो गयी थी | नीलेश जोर जोर से रोने लगा और मेनेजर को बुलाया |  मेनेजर ने तुरंत एम्बुलेंस को बुलाया और दोनों को हॉस्पिटल ले गये |



नीलिमा तो मर चुकी थी लेकिन नीतू को थोड़ी देर में होश आ गया |जैसे ही नीतू को होश आया तो उसके पीछे उसकी बहन की आत्मा थी जो उससे बोल रही थी “तूने मुझे मार दिया ” | यह कहकर वो गायब हो गयी |नीलिमा काफी बुरी तरह डर गयी अब नीलेश में नीतू से सारी घटना पूछी तो उसने बताया कि “रात को जब मै पानी पीने उठी रात तो देखा नीतू फिर से बालकनी में बैठी थी और कुछ बडबडा रही थी और मै जैसे उसके पास गयी और उससे पूछा कि वो यहा क्या कर रही है तो उसने मुझे जोर से धक्का दिया और मेरा सर दीवार से टकरा गया और मै बेहोश हो गयी और इसके अलावा मुझे कुछ याद नहीं है

जैसे ही नीतू हॉस्पिटल से छुटी तो वो नीलेश के साथ उस होटल में गयी और उसने काउंटर पर मेनेजर से बात करने को कहा तो उसने बताया की आपकी घटना के दुसरे दिन मेनेजर की मौत हो गयी थी | वो दोनों शॉक हो गये |उन्होंने क्लीनर से माजरा समझने की कोशिश की तो उसने बताया कि आप जिस रूम में रुके थे वो प्रेतबाधित था और रात में वहा कोई नहीं रुकता है लेकिन मेनेजर ने पैसो के चक्कर में रूम आपको दे दिया | इस रूम में पहले भी दो मौते हो चुकी है | अब सारी बात नीलेश को समझ में आयी |

इस घटना के बाद नीलेश काफी सदमे में चला गया और कभी किसी होटल में नहीं रुका | 

Monday, January 6, 2020

January 06, 2020

भटकती रूह भूत - प्रेत की सच्ची कहानी दिलदाहलने वाली सच्ची तस्बीर

भूत - प्रेत की सच्ची कहानी,  दिलदाहलने वाली सच्ची कहानी, यहा   कहानी  ‘रठासी’ नाम का एक ऐतिहासिक गांव की है | Bhoot - The true story of the phantom, the true story of the heart, here is the story of a historical village named 'Rathasi'.




भूत-प्रेत के किस्से सुनने में बेहद रोमांचक और दिलचस्प लगते हैं लेकिन क्या हो जब यह किस्से सिर्फ किस्से ना रहकर एक हकीकत की तरह आपके सामने आएं? आज की युवा पीढ़ी भूत और आत्माओं के होने पर विश्वास नहीं करती लेकिन जिस पर आप विश्वास नहीं करते वह असल में है ही नहीं यह तो संभव नहीं है ना. आज हम ऐसे ही भूतहा स्थान से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं एक आत्मा ने किया था.  जोधपुर (राजस्थान) स्थित बावड़ियों के किस्से स्थानीय लोगों में बहुत मशहूर हैं. यहां पानी की कई बावड़ियां हैं जिनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसे भूत ने बनवाया था |


 जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित ‘रठासी’ नाम का एक ऐतिहासिक गांव है. मारवाड़ के इतिहास पर नजर डालें तो यह ज्ञात होता है कि जब जोधपुर में रहने वाले राजपूतों की चम्पावत शाखा का विभाजन हुआ तो उनमें से अलग हुए एक दल ने कापरडा गांव में रहना शुरू किया. लेकिन इस स्थान पर रहने वाले युवा राजपूत राजकुमारों ने गांव में साधना करने वाले साधु-महात्माओं को परेशान करना शुरू कर दिया. उन राजकुमारों से क्रोधित होकर साधुओं ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनके आने वाली पीढ़ी इस गांव में नहीं रह पाएगी.  साधुओं के श्राप की बात जब राजकुमारों ने अपने घर में बताई तो सभी भयभीत हो गए और उस गांव को छोड़कर चले गए. इस गांव को छोड़कर वह जिस गांव में रहने के लिए गए उस गांव का का नाम है रठासी गांव. यह जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऐतिहासिक गांव है |



  इस गांव में एक बावड़ी है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह भूतों के सहयोग से बनी है अर्थात उस बावड़ी को बनाने में भूत-प्रेतों ने गांव वालों की सहायता की थी. ठाकुर जयसिंह के महल में स्थित इस बावड़ी को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं. इस बावड़ी के विषय में यह कहानी प्रचलित है कि एक बार जब ठाकुर जयसिंह घोड़े पर सवार होकर जोधपुर से रठासी गांव की ओर जा रहे थे तब रास्ते में ठाकुर साहब का घोड़ा उनके साथ-साथ चलने वाले सेवकों से पीछे छूट गया और इतने में रात हो गई.  राजा का घोड़ा काफी थक चुका था और उसे बहुत प्यास लगी थी. रास्ते में एक तालाब को देखकर ठाकुर जयसिंह अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए ले गए.


आधी रात का समय था घोड़ा जैसे ही आगे बढ़ा राजा को एक आकृति दिखाई दी जिसने धीरे-धीरे इंसानी शरीर धारण कर लिया. राजा उसे देखकर डर गया, उस प्रेत ने राजा को कहा कि मुझे प्यास लगी है लेकिन श्राप के कारण मैं इस कुएं का पानी नहीं पी सकता. राजा ने उस प्रेत को पानी पिलाया और राजा की दयालुता देखकर प्रेत ने उसे कहा कि वह जो भी मांगेगा वह उसे पूरी कर देगा.  राजा ने प्रेत को कहा कि वह उसके महल में एक बावड़ी का निर्माण करे और उसके राज्य को सुंदर बना दे. भूत ने राजा के आदेश को स्वीकारते हुए कहा कि वो ये कार्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं करेगा, लेकिन दिनभर में जितना भी काम होगा वह रात के समय 100 गुना और बढ़ जाएगा |


उस प्रेत ने राजा को यह राज किसी को ना बताने के लिए कहा. इस घटना के दो दिन बाद ही महल और बावड़ी की इमारतें बनने लगीं. रात में पत्थर ठोंकने की रहस्यमय आवाजें आने लगीं, दिन-प्रतिदिन निर्माण काम तेज गति से बढ़ने लगा. लेकिन रानी के जिद करने पर राजा ने यह राज रानी को बता दिया कि आखिर निर्माण इतनी जल्दी कैसे पूरा होता जा रहा है. राजा ने जैसे ही यह राज रानी को बताया सारा काम वहीं रुक गया. बावड़ी भी ज्यों की त्यों ही रह गई. इस घटना के बाद किसी ने भी उस बावड़ी को बनाने की कोशिश नहीं की |

Sunday, January 5, 2020

January 05, 2020

विक्रम और बेताल एक मजेदार कहानी, जब राजा के छ: लड़के थे

विक्रम और बेताल एक मजेदार कहानी, जब राजा के छ: लड़के थे जो सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे। Vikram and Betal A funny story, when the king had six boys who were all very clever and powerful.




बहुत पुरानी बात है। धारा नगरी में गंधर्वसेन नाम का एक राजा राज करते थे। उसके चार रानियाँ थीं। उनके छ: लड़के थे जो सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे। संयोग से एक दिन राजा की मृत्यु हो गई और उनकी जगह उनका बड़ा बेटा शंख गद्दी पर बैठा। उसने कुछ दिन राज किया, लेकिन छोटे भाई विक्रम ने उसे मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता गया और वह सारे जम्बूद्वीप का राजा बन बैठा। एक दिन उसके मन में आया कि उसे घूमकर सैर करनी चाहिए और जिन देशों के नाम उसने सुने हैं, उन्हें देखना चाहिए। सो वह गद्दी अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर, योगी बन कर, राज्य से निकल पड़ा।

उस नगर में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। एक दिन देवता ने प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया और कहा कि इसे जो भी खायेगा, वह अमर हो जायेगा। ब्रह्मण ने वह फल लाकर अपनी पत्नी को दिया और देवता की बात भी बता दी। ब्राह्मणी बोली, “हम अमर होकर क्या करेंगे? हमेशा भीख माँगते रहेंगें। इससे तो मरना ही अच्छा है। तुम इस फल को ले जाकर राजा को दे आओ और बदले में कुछ धन ले आओ।”

यह सुनकर ब्राह्मण फल लेकर राजा भर्तृहरि के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। भर्तृहरि ने फल ले लिया और ब्राह्मण को एक लाख रुपये देकर विदा कर दिया। भर्तृहरि अपनी एक रानी को बहुत चाहता था। उसने महल में जाकर वह फल उसी को दे दिया। रानी की मित्रता शहर-कोतवाल से थी। उसने वह फल कोतवाल को दे दिया। कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। वह उस फल को उस वेश्या को दे आया। वेश्या ने सोचा कि यह फल तो राजा को खाना चाहिए। वह उसे लेकर राजा भर्तृहरि के पास गई और उसे दे दिया। भर्तृहरि ने उसे बहुत-सा धन दिया; लेकिन जब उसने फल को अच्छी तरह से देखा तो पहचान लिया। उसे बड़ी चोट लगी, पर उसने किसी से कुछ कहा नहीं। उसने महल में जाकर रानी से पूछा कि तुमने उस फल का क्या किया।


रानी ने कहा, “मैंने उसे खा लिया।” राजा ने वह फल निकालकर दिखा दिया। रानी घबरा गयी और उसने सारी बात सच-सच कह दी। भर्तृहरि ने पता लगाया तो उसे पूरी बात ठीक-ठीक मालूम हो गयी। वह बहुत दु:खी हुआ। उसने सोचा, यह दुनिया माया-जाल है। इसमें अपना कोई नहीं। वह फल लेकर बाहर आया और उसे धुलवाकर स्वयं खा लिया। फिर राजपाट छोड, योगी का भेस बना, जंगल में तपस्या करने चला गया।

भर्तृहरि के जंगल में चले जाने से विक्रम की गद्दी सूनी हो गयी। जब राजा इन्द्र को यह समाचार मिला तो उन्होंने एक देव को धारा नगरी की रखवाली के लिए भेज दिया। वह रात-दिन वहीं रहने लगा।

भर्तृहरि के राजपाट छोड़कर वन में चले जाने की बात विक्रम को मालूम हुई तो वह लौटकर अपने देश में आया। आधी रात का समय था। जब वह नगर में घुसने लगा तो देव ने उसे रोका। राजा ने कहा, “मैं विक्रम हूँ। यह मेरा राज है। तुम रोकने वाले कौन होते होते?”

देव बोला, “मुझे राजा इन्द्र ने इस नगर की चौकसी के लिए भेजा है। तुम सच्चे राजा विक्रम हो तो आओ, पहले मुझसे लड़ो।”\n\n

दोनों में लड़ाई हुई। राजा ने ज़रा-सी देर में देव को पछाड़ दिया। तब देव बोला, “हे राजन्! तुमने मुझे हरा दिया। मैं तुम्हें जीवन-दान देता हूँ।”

इसके बाद देव ने कहा, “राजन्, एक नगर और एक नक्षत्र में तुम तीन आदमी पैदा हुए थे। तुमने राजा के घर में जन्म लिया, दूसरे ने तेली के और तीसरे ने कुम्हार के। तुम यहाँ का राज करते हो, तेली पाताल का राज करता था। कुम्हार ने योग साधकर तेली को मारकर शम्शान में पिशाच बना सिरस के पेड़ से लटका दिया है। अब वह तुम्हें मारने की फिराक में है। उससे सावधान रहना।”

इतना कहकर देव चला गया और राजा महल में आ गया। राजा को वापस आया देख सबको बड़ी खुशी हुई। नगर में आनन्द मनाया गया। राजा फिर राज करने लगा।

एक दिन की बात है कि शान्तिशील नाम का एक योगी राजा के पास दरबार में आया और उसे एक फल देकर चला गया। राजा को आशंका हुई कि देव ने जिस आदमी को बताया था, कहीं यह वही तो नहीं है! यह सोच उसने फल नहीं खाया, भण्डारी को दे दिया। योगी आता और राजा को एक फल दे जाता।

संयोग से एक दिन राजा अपना अस्तबल देखने गया था। योगी वहीं पहुँच और फल राजा के हाथ में दे दिया। राजा ने उसे उछाला तो वह हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़ा। उसी समय एक बन्दर ने झपटकर उसे उठा लिया और तोड़ डाला। उसमें से एक लाल निकला, जिसकी चमक से सबकी आँखें चौंधिया गयीं। राजा को बड़ा अचरज हुआ। उसने योगी से पूछा, “आप यह लाल मुझे रोज़ क्यों दे जाते हैं?”

योगी ने जवाब दिया, “महाराज! राजा, गुरु, ज्योतिषी, वैद्य और बेटी, इनके घर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”

राजा ने भण्डारी को बुलाकर पीछे के सब फल मँगवाये। तुड़वाने पर सबमें से एक-एक लाल निकला। इतने लाल देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ। उसने जौहरी को बुलवाकर उनका मूल्य पूछा। जौहरी बोला, “महाराज, ये लाल इतने कीमती हैं कि इनका मोल करोड़ों रुपयों में भी नहीं आँका जा सकता। एक-एक लाल एक-एक राज्य के बराबर है।”

यह सुनकर राजा योगी का हाथ पकड़कर गद्दी पर ले गया। बोला, “योगीराज, आप सुनी हुई बुरी बातें, दूसरों के सामने नहीं कही जातीं।”

राजा उसे अकेले में ले गया। वहाँ जाकर योगी ने कहा, “महाराज, बात यह है कि गोदावरी नदी के किनारे मसान में मैं एक मंत्र सिद्ध कर रहा हूँ। उसके सिद्ध हो जाने पर मेरा मनोरथ पूरा हो जायेगा। तुम एक रात मेरे पास रहोगे तो मंत्र सिद्ध हो जायेगा। एक दिन रात को हथियार बाँधकर तुम अकेले मेरे पास आ जाना।”

राजा ने कहा “अच्छी बात है।”

इसके उपरान्त योगी दिन और समय बताकर अपने मठ में चला गया।

वह दिन आने पर राजा अकेला वहाँ पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, “यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर मसान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा लटका है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा वहाँ से चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन राजा हिम्मत से आगे बढ़ता गया। जब वह मसान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे किर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

राजा ने नीचे आकर पूछा, “तू कौन है?”

राजा का इतना कहना था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा। राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी वह मुर्दा फिर पेड़ पर जा लटका। राजा फिर चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। बोला, “बता, तू कौन है?”

मुर्दा चुप रहा।

तब राजा ने उसे एक चादर में बाँधा और योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है?”

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “मैं एक शर्त पर चलूँगा। अगर तू रास्ते में बोलेगा तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।”

राजा ने उसकी बात मान ली। फिर बेताल बोला, “ पण्डित, चतुर और ज्ञानी, इनके दिन अच्छी-अच्छी बातों में बीतते हैं, जबकि मूर्खों के दिन कलह और नींद में। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।

Saturday, January 4, 2020

January 04, 2020

यहा एक सच्ची कहानी है जो मेरे दोस्त के साथ घाटी

यहा घटना एक सच्ची है, जो की मेरे राहुल दोस्त के साथ घाटी :- The incident here is a true one, that Valley with my Rahul friend.



मेरा नाम राहुल  है। और में जामनगर शहर में रहती हूँ। मै एक टीचर हूँ। मुजे बचपन से ही तैराकी का जबरा शौख रहा है। बचपन में हम जब खंभालिया तालुके में रहते थे, तभी पिताजी मुजे और मेरी बहन प्रीती को नदी पर तैरना सिखाने ले जाते थे।


रामनाथ मंदिर के पास बहने वाली “घी नदी” साल के नौ महीने पानी से लबरेज़ (भरपूर) रहती है। उनही दिनों नदी में तैराकी करते वक्त मै एक भयानक एहसास से गुजरी थी। जिसने मेरी जिंदगी बदल कर रख दी। मेरे साथ वह दर्दनाक हाथसा हुआ तब में सोलह साल की थी। और ग्यारहवि कक्षा में थी।


वह के सामान्य दिन था, रोज़ की तरह मै मेरी बहन प्रीती और पापा नदी पर गए। उस दिन पानी काफी ठंडा था। इस लिए पापा ने मुजे और प्रीती को कमर से ज्यादा गहरे पानी मै जाने से मना किया था। और वह खुद नदी के पास स्थित रामनाथ मंदिर में दर्शन करने चले गए।


मै और प्रीती पानी में उतरी और हसी मज़ाक करते हुए तैराकी करने लगी। तभी अचानक मुजे महसूस हुआ की मेरी बहन प्रीती मुजसे दूर थोड़े गहरे पानी में जाने लगी। मै फौरन उस पर चिल्लाई, पर वह फिर भी आगे ही आगे गहरे पानी में जाने लगी।


मै प्रीती को पकड़ के वापीस लाने उसके पीछे पीछे गहरे पानी में जाने लगी। अब पानी मेरे गले तक था। अचानक प्रीती मेरी आँखों से औजल (गायब) हो गयी। मुजे लगा वह डूब गयी। और तब खौफ के मारे, मेरी विकराल चीख निकल गयी। तभी अचानक प्रीती पानी से बाहर आई और मुजे देख कर हंसने लगी। मैने पानी में ही तैरते तैरते उसे ज़ोर का लाफा मार दिया… और उसके बाद जो हुआ उस मंज़र को देख कर मेरी रूह कांप गयी।


प्रीती मुजे घूरने लगी… और प्रीती पानी में तैरते हुए पानी में ऊपर उठने लगी… वह कमर तक पानी से ऊपर उठ गयी… गले तक गहरे पानी में तैरते हुए किसी इन्सान का ऐसा करना नामुमकिन होता है, यह मुजे पता था। फौरन में समज गयी की मेरी जान आफत में है।


तभी यक यक मेरी नज़र नदी किनारे पर पड़ी… मैने देखा की नदी किनारे मेरे पिता और मेरी बहन प्रीती खड़े हैं। और मेरी और देख कर चिल्ला रहे हैं। अब मै उस पानी मै ऊपर उठे हुए भूत की और देखना भी नहीं चाहती थी, क्यूँ की मुजे पता चल गया था की उसने मेरी छोटी बहन का रूप ले कर मुजे गहरे पानी में लाने का जाल बिछाया था। मै एक गहरी साँस भर के, ज़ोर लगाते हुए, डरते कांपते किनारे की और तैरने लगी। पर वह ज़ालिम भूतनी कहाँ मुजे इतनी जल्दी छौड्ने वाली थी। उसने अपना असली रूप दिखाया और घूम कर मेरे सामने आ खड़ी हुई।


उसके मुह से मांस लटक रहा था। दाँत उसके काले और नुकीले थे। और उसके बालों में कीड़े लगे थे। आंखे खून भरी लाल थी। और वह भूतनी मुजे ऐसे देख रही थी जैसे वह मुजे खा ही जाएगी। मेर हाथ पैर उसे देख कर, डर के मारे जमने लगे थे। फिर भी मैने उस भूतनी के पास से घुमाव ले कर, तैर कर किनारे की और तैर कर भागने की कौसिस की। पर उसने पानी में जा कर मेरा एक पैर पकड़ लिया।


उसकी पकड़ आज भी मुजे याद है। जेसे किसी गरम लोहे की जंजीर ने जकड़ रखा हो। जैसे ही उसने मेरा पैर पकड़ा मेरी हिम्मत जवाब दे गयी। और मैने पानी में तैरना छौड़ दिया। और आने वाली दर्द नाक मौत के लिए मै खूद को तयार करने लगी। दो तीन बार मै पानी के अंदर बाहर हुई। तभी अचानक मेरे हाथ को किसी ने कस कर पकड़ा और वह पवन की रफ्तार से खींच कर मुजे किनारे की और बहाने लगा। और उसी वक्त, तुरंत ही मेरे पैर की पकड़ भी छूट गयी। मुजे जब हौश आया तो मै नदी किनारे पड़ी थी। और मेरे पापा और प्रीती पास बैठ कर मुजे हौश मै लाने की कौशीस कर रहे थे।


“प्रीती ने कहा की वह कभी गहरे पानी की और गयी ही नहीं थी। मेरे पापा ने कहा की उसे पानी में कोई भूतनी मेरे सामने खड़ी दिखी ही नहीं। पापा ने कहा की गहरे पानी से नदी की और में खुद बह कर आई, उन्होने मुजे ना तो खुद बचाया था, नाहीं किसी और को मुजे नदी किनारे वापीस खिचते हुए देखा।”

“शायद उस पानी में एक बुरी शक्ति थी जो मेरा भोग लेना चाहती थी। और वहीं पर एक भली शक्ति थी जिसने मुजे उस भूतनी के चंगुल से छुड़ा कर किनारे पर ला फेंका।“