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Saturday, January 4, 2020

यहा एक सच्ची कहानी है जो मेरे दोस्त के साथ घाटी

यहा घटना एक सच्ची है, जो की मेरे राहुल दोस्त के साथ घाटी :- The incident here is a true one, that Valley with my Rahul friend.



मेरा नाम राहुल  है। और में जामनगर शहर में रहती हूँ। मै एक टीचर हूँ। मुजे बचपन से ही तैराकी का जबरा शौख रहा है। बचपन में हम जब खंभालिया तालुके में रहते थे, तभी पिताजी मुजे और मेरी बहन प्रीती को नदी पर तैरना सिखाने ले जाते थे।


रामनाथ मंदिर के पास बहने वाली “घी नदी” साल के नौ महीने पानी से लबरेज़ (भरपूर) रहती है। उनही दिनों नदी में तैराकी करते वक्त मै एक भयानक एहसास से गुजरी थी। जिसने मेरी जिंदगी बदल कर रख दी। मेरे साथ वह दर्दनाक हाथसा हुआ तब में सोलह साल की थी। और ग्यारहवि कक्षा में थी।


वह के सामान्य दिन था, रोज़ की तरह मै मेरी बहन प्रीती और पापा नदी पर गए। उस दिन पानी काफी ठंडा था। इस लिए पापा ने मुजे और प्रीती को कमर से ज्यादा गहरे पानी मै जाने से मना किया था। और वह खुद नदी के पास स्थित रामनाथ मंदिर में दर्शन करने चले गए।


मै और प्रीती पानी में उतरी और हसी मज़ाक करते हुए तैराकी करने लगी। तभी अचानक मुजे महसूस हुआ की मेरी बहन प्रीती मुजसे दूर थोड़े गहरे पानी में जाने लगी। मै फौरन उस पर चिल्लाई, पर वह फिर भी आगे ही आगे गहरे पानी में जाने लगी।


मै प्रीती को पकड़ के वापीस लाने उसके पीछे पीछे गहरे पानी में जाने लगी। अब पानी मेरे गले तक था। अचानक प्रीती मेरी आँखों से औजल (गायब) हो गयी। मुजे लगा वह डूब गयी। और तब खौफ के मारे, मेरी विकराल चीख निकल गयी। तभी अचानक प्रीती पानी से बाहर आई और मुजे देख कर हंसने लगी। मैने पानी में ही तैरते तैरते उसे ज़ोर का लाफा मार दिया… और उसके बाद जो हुआ उस मंज़र को देख कर मेरी रूह कांप गयी।


प्रीती मुजे घूरने लगी… और प्रीती पानी में तैरते हुए पानी में ऊपर उठने लगी… वह कमर तक पानी से ऊपर उठ गयी… गले तक गहरे पानी में तैरते हुए किसी इन्सान का ऐसा करना नामुमकिन होता है, यह मुजे पता था। फौरन में समज गयी की मेरी जान आफत में है।


तभी यक यक मेरी नज़र नदी किनारे पर पड़ी… मैने देखा की नदी किनारे मेरे पिता और मेरी बहन प्रीती खड़े हैं। और मेरी और देख कर चिल्ला रहे हैं। अब मै उस पानी मै ऊपर उठे हुए भूत की और देखना भी नहीं चाहती थी, क्यूँ की मुजे पता चल गया था की उसने मेरी छोटी बहन का रूप ले कर मुजे गहरे पानी में लाने का जाल बिछाया था। मै एक गहरी साँस भर के, ज़ोर लगाते हुए, डरते कांपते किनारे की और तैरने लगी। पर वह ज़ालिम भूतनी कहाँ मुजे इतनी जल्दी छौड्ने वाली थी। उसने अपना असली रूप दिखाया और घूम कर मेरे सामने आ खड़ी हुई।


उसके मुह से मांस लटक रहा था। दाँत उसके काले और नुकीले थे। और उसके बालों में कीड़े लगे थे। आंखे खून भरी लाल थी। और वह भूतनी मुजे ऐसे देख रही थी जैसे वह मुजे खा ही जाएगी। मेर हाथ पैर उसे देख कर, डर के मारे जमने लगे थे। फिर भी मैने उस भूतनी के पास से घुमाव ले कर, तैर कर किनारे की और तैर कर भागने की कौसिस की। पर उसने पानी में जा कर मेरा एक पैर पकड़ लिया।


उसकी पकड़ आज भी मुजे याद है। जेसे किसी गरम लोहे की जंजीर ने जकड़ रखा हो। जैसे ही उसने मेरा पैर पकड़ा मेरी हिम्मत जवाब दे गयी। और मैने पानी में तैरना छौड़ दिया। और आने वाली दर्द नाक मौत के लिए मै खूद को तयार करने लगी। दो तीन बार मै पानी के अंदर बाहर हुई। तभी अचानक मेरे हाथ को किसी ने कस कर पकड़ा और वह पवन की रफ्तार से खींच कर मुजे किनारे की और बहाने लगा। और उसी वक्त, तुरंत ही मेरे पैर की पकड़ भी छूट गयी। मुजे जब हौश आया तो मै नदी किनारे पड़ी थी। और मेरे पापा और प्रीती पास बैठ कर मुजे हौश मै लाने की कौशीस कर रहे थे।


“प्रीती ने कहा की वह कभी गहरे पानी की और गयी ही नहीं थी। मेरे पापा ने कहा की उसे पानी में कोई भूतनी मेरे सामने खड़ी दिखी ही नहीं। पापा ने कहा की गहरे पानी से नदी की और में खुद बह कर आई, उन्होने मुजे ना तो खुद बचाया था, नाहीं किसी और को मुजे नदी किनारे वापीस खिचते हुए देखा।”

“शायद उस पानी में एक बुरी शक्ति थी जो मेरा भोग लेना चाहती थी। और वहीं पर एक भली शक्ति थी जिसने मुजे उस भूतनी के चंगुल से छुड़ा कर किनारे पर ला फेंका।“

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